
गांव में गुड़ीघर जहां पर ग्राम के देवता का स्थान होता है । गांव में निवासरत सभी वहां कोई भी नई फसल अथवा वनोपज को देवता को समर्पित करके ही उपयोग करते हैं । चाहे महुआ , डोरी , चार , ईमली , साल के बीज आदि वनोपज तथा कृषि का भी धान मड़िया , कोदों -कुटकी , सावा , उड़द इन सभी अनाज को भी समर्पित किए बिना उपयोग में नहीं लाते । यहां के बुजुर्ग - सियान लोग भोजन के थाली से भी अपने देवता को अर्पित करते हैं । बस्तर के जनजाति कृषक चापड़ाचटनी , मड़िया , पेज पीकर परिश्रम कर कमाते हैं । गांव में निंदा - चारी , चुगली से दूर अत्यंत आत्मीयता से और सहकारिता से एक - दूसरे का साथ देकर जीवन - यापन करते हैं । इनके आय का एक बड़ा भाग वनों से प्राप्त होता है यह भी कहा जा सकता है कि इनके जीवन का आधार वन है ।
वर्तमान में बस्तर को देखने से एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि यहां के सरल , सज्जन , भोला - भाला जनजाति समाज की प्रसन्नता , आनंद , मस्ती कही खो गई । इनके प्रिय संगी - साथी जंगल है , जिस पर किसकी कुदृष्टि पड़ी है कि वनों का अन्दर - अन्दर सफाया होते जा रहा है । जनजाति वनों की रक्षा की बात करें आघाज कौन सुने ? आवाज दबकर रह जाती हैं । इनके गांव की कुलदेवी माता शीतला , क्षेत्र की कुलदेवी माता दंतेश्वरी के आराधना में भी व्यवधान आने लगी है । परलकोट क्षेत्र प्रतापपुर में जो शहीद गेंदसिंह का गांव है , वहां पिछले दो वर्षों से माता दंतेश्वरी की पालकी यात्रा तथा एक प्राचीन कार्यक्रम महिषासूर मर्दन विघ्न डाला जा रहा है । अभी - अभी कोयलीबेड़ा क्षेत्र में ग्राम मदलेगांव में देवपूजा के समय उपस्थित 40 गांव के 500 जनजातियों के सामने उस 40 गांव के गायता ( जनजाति देव पुजारी ) गस्सूराम उसेंडी की हत्या क्यों कर दी जाती है , हत्यारे इस हत्या से क्या संदेश देना चाहते हैं ? क्या उद्देश्य जनजाति - आदिवासी समाज में दहशत फैलाना है ? क्या जनजाति समाज का सामाजिक धार्मिक नेतृत्व को समाप्त करना है ? क्या इनकी मंशा है कि जनजाति समाज विकास के नए अवसरों को न छुए ? क्या आदिवासी समाज के आवाज को दबाना चाहते है ? वास्तव में हर चिन्तनशील व्यक्ति के मन को यह बात कचोटती हैं । जनजाति समाज की संस्कृति ही उनकी विशेषता है , परंपरा उनकी ताकत है , श्रद्धा केंद्र , गुड़ीघर , सरना , देवरास , देवालय आदि उनके मन की शक्ति है , उनका मनोबल है , जो किसी भी परिस्थिति से उबरने में सहायक है । इसलिए जनजाति समाज के संस्कृति , रीति , परंपरा , श्रद्धा केंद्रों का बिना छेड़छाड़ व परिवर्तन किए संरक्षण करना चाहिए । यह दायित्व केवल आदिवासी समाज का ही नहीं अपितु संपूर्ण समाज के साथ सरकार का भी है । समाज के बुद्धजीवी वर्ग का विशेष दायित्व है , बस्तर को उसकी संस्कृति व परंपराओं की दृष्टि से समझने की आवश्यकता हैं , नहीं तो बस्तर अपनी विशेषता खोता जाएगा ।
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